Mahishasuramardini-06

अयि शरणागत-वैरि-वधूवर-वीर-वराभय-दायकरे
त्रिभुवन-मस्तक-शूल-विरोधि शिरोधि कृतामल-शूलकरे ।
दुमिदुमि-तामर-दुन्दुभिनाद-महो-मुखरीकृत-तिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

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Mahishasuramardini-05

अयि रण-दुर्मद-शत्रु-वधोदित-दुर्धर-निर्जर-शक्तिभृते
चतुर-विचार-धुरीण-महाशिव-दूतकृत-प्रमथाधिपते ।
दुरित-दुरीह-दुराशय-दुर्मति-दानवदूत-कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

Mahishasuramardini-04

अयि शतखण्ड-विखण्डित-रुण्ड-वितुण्डित-शुण्ड-गजाधिपते
रिपु-गज-गण्ड-विदारण-चण्ड-पराक्रम-शुण्ड-मृगाधिपते ।
निज-भुज-दण्ड-निपातित-खण्ड-विपातित-मुण्ड-भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

Mahishasuramardini-03

अयि जगदम्ब-मदम्ब-कदम्ब-वनप्रिय-वासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्ग-हिमालय-शृङ्ग-निजालय-मध्यगते ।
मधु-मधुरे मधु-कैटभ-गञ्जिनि कैटभ-भञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥